बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि किसी काम से पहले अगर छींक आजाए तो समझो बंटाधार हो गया। वहीं बुजुर्गों की कूटनीति या कहें डिप्लोमेसी देखिए। अगर आप आती हुई छींक को रोक लें तो कहेंगे, आती हुई छींक को कभी नहीं रोकते। भला छेंक ना हुई हुई आती आती हुई लक्ष्मी हो गयी जिसे ना रोका जाए।

दरसल यह हमारी दूसरी प्रकृति है कि हम छींकों को रोकना ज़रूर चाहते हैं। और कोरोना वायरस (COVID-19) के आने के बाद से, उन्हें रोकने की ललक और भी तेज हो गई है।

छींक रोकने पर विशेषज्ञों की राय

हम छींक को दबाने की कोशिश करते हैं ताकि हम कीटाणु ना फैलाएं या अपने आसपास के लोगों को बाधित ना करें। लेकिन छींक को अंदर रखने से आपको जितना पता होगा उससे ज्यादा नुकसान हो सकता है।

एलर्जी और नैदानिक ​​​​इम्यूनोलॉजी विशेषज्ञ, डेवोन प्रेस्टन, एमडी कहते हैं “जबकि छींकना संक्रमण के प्रसार में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, यह साइनस से जलन, एलर्जी और अन्य विदेशी मलबे को हटाने के लिए भी आवश्यक है। अगर हमें छींक नहीं आती है, तो हमारे शरीर संभावित हानिकारक पदार्थों को हमारे साइनस या फेफड़ों में जाने दे सकते हैं।”

छींक जैसे नाज़ुक विषय को मज़ाक में हर्गिज़ ना लें। छींक को सस्ती लोकल चीज़ ना माने जनाब। यह अनेकों अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च का विषय है। इसके पीछे अविश्वसनीय बल होता है। क्या आप जानते है कि मामूली सी लगने वाली छींक की गति लगभग 120-150 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। तो जान लीजिए शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन से भी तेज़ गति से चलने वाली छींक तो अगली बार आदर सत्कार से पुकारें। छींक को रोकने से सभी प्रकार के हानिकारक परिणाम हो सकते हैं जैसे कि ईयरड्रम (कान का पर्दा) फटना और गला (ग्रसनी) टूटना इत्यादि।

Why sneeze is important
Sneezing is infectious | Pic Courtesy: Freepik

तो क्या खूब छींके जमकर छींकें ?

COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिए हर कोई सचेत प्रयास कर रहा है, आप उन जोरदार छींकों को बाहर निकालने से डर सकते हैं। लेकिन अपने शरीर को अपना काम करने से न रोकें। बस यह सुनिश्चित करें कि आप उन छींक बमों के दौरान अपना मुंह और नाक ढक लें। इसके अलावा, छींक के सत्र समाप्त होने के बाद अपने हाथों को अच्छी तरह से धोना और आस-पास की सतहों को पोंछना सुनिश्चित करें। तो दोस्तों यह मत पूछना किसने मगर उसने कहा था छींक जरूर मारें मगर तहज़ीब के साथ!

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