
Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer: “लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…” यह मात्र एक कविता की पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि यह दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए सफलता का महामंत्र है। जब भी कोई व्यक्ति जीवन के संघर्षों से निराश होने लगता है, तो ये शब्द उसमें एक नई ऊर्जा और अटूट विश्वास फूंक देते हैं।लेकिन, क्या आप जानते हैं कि इस बेहद लोकप्रिय और प्रेरणादायक कविता के असली रचयिता (Author) कौन हैं?
अक्सर इस कविता के लेखक (Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer) के नाम को लेकर लोगों के बीच एक बहुत बड़ा भ्रम (Misconception) रहा है। इस विस्तृत लेख में हम न केवल इस भ्रम को दूर करेंगे, बल्कि इस कालजयी कविता के वास्तविक रचयिता, इसके पीछे की कहानी और इस पूरी कविता के अर्थ को भी विस्तार से समझेंगे।
कविता के रचयिता को लेकर सबसे बड़ा भ्रम: बच्चन या द्विवेदी?
अक्सर जब भी ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ कविता का जिक्र आता है, तो अधिकांश लोगों के ज़हन में महान कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन का नाम आता है। इंटरनेट से लेकर कई किताबों तक में इस कविता का श्रेय बच्चन साहब को दे दिया गया है।
यह भ्रम क्यों पैदा हुआ?
इस भ्रम के पीछे का सबसे बड़ा कारण है बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन जी ने देश-विदेश के कई बड़े मंचों पर, जिनमें उनका बेहद लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) भी शामिल है, इस कविता को अपनी ओजस्वी, गंभीर और प्रभावशाली आवाज़ में पाठ किया है।
जब अमिताभ जी अपनी दमदार आवाज़ में “नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है…” पढ़ते हैं, तो सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। चूंकि अमिताभ बच्चन जी अपने पूज्य पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन की कविताएं अक्सर मंचों पर सुनाते हैं, इसलिए लोगों ने सहज ही यह मान लिया कि यह अद्भुत रचना भी बच्चन साहब की ही है।

अमिताभ बच्चन ने खुद किया सच का खुलासा
इस ऐतिहासिक भूल और भ्रम को किसी और ने नहीं, बल्कि खुद अमिताभ बच्चन जी ने ही सुधारा। सोशल मीडिया (जैसे एक्स/ट्विटर और फेसबुक) के माध्यम से अमिताभ बच्चन ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया और अपने प्रशंसकों को बताया कि:
“यह बेहद लोकप्रिय कविता ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ (Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer) मेरे बाबूजी (डॉ. हरिवंश राय बच्चन) की नहीं है। इसके वास्तविक रचयिता महान कवि सोहनलाल द्विवेदी जी हैं।”
इस प्रकार, खुद बच्चन परिवार की ओर से यह साफ कर दिया गया कि इस अमर कविता के असली हकदार और रचनाकार राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी जी ही हैं। कुछ शोधकर्ता इसे सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की रचना भी बताते हैं, लेकिन साहित्यिक प्रमाणों और व्यापक सहमति के अनुसार, इसे सोहनलाल द्विवेदी जी की ही कृति माना जाता है।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती कविता के वास्तविक रचयिता: राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का परिचय
इस महान कविता के पीछे छिपे व्यक्तित्व को जानना बेहद जरूरी है। सोहनलाल द्विवेदी जी (Poem Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer) हिंदी साहित्य जगत के देदीप्यमान नक्षत्र हैं।
| मुख्य विवरण | जानकारी |
| पूरा नाम | सोहनलाल द्विवेदी |
| जन्म | 22 फरवरी 1906 (बिंदकी, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश) |
| उपाधि | राष्ट्रकवि |
| मुख्य विधा | राष्ट्रीय चेतना, प्रेरणादायक और बाल कविताएं |
| प्रमुख कृतियाँ | भैरवी, पूजागीत, सेवाग्राम, युगाधार, दूधबताशा (बाल कविताएं) |
| पुरस्कार | पद्म श्री (1969) |
सोहनलाल द्विवेदी जी की कविताओं में देशप्रेम, ऊर्जा और जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण कूट-कूट कर भरा होता था। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर कई रचनाएँ कीं। ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ उनकी उसी लेखन शैली का जीवंत उदाहरण है जो सीधे पाठक के हृदय पर प्रहार करती है।
‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ – पूरी कविता (Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer and Full Poem Lyrics)
आइए, अब इस पूरी कविता के मूल पाठ (Lyrics) को पढ़ते हैं, जो आज भी हर निराश मन में आशा का संचार करती है:
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
कविता का विस्तृत भावार्थ और जीवन प्रबंधन (Detailed Analysis & Meaning)
यह कविता केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) और जीवन प्रबंधन (Life Management) की एक बेहतरीन गाइड है। द्विवेदी जी ने इस कविता को तीन मुख्य पैराग्राफों में विभाजित करके जीवन के तीन बड़े सत्यों को उजागर किया है:
1. चींटी का उदाहरण: निरंतरता और आंतरिक साहस (Consistency & Inner Strength)
कविता के पहले भाग में कवि ने एक बेहद छोटे जीव ‘चींटी’ का उदाहरण दिया है।
- सीख: एक नन्हीं सी चींटी अपने वजन से ज्यादा का दाना लेकर दीवार पर चढ़ती है। वह बार-बार गिरती है, लेकिन हार नहीं मानती। उसका आंतरिक विश्वास उसकी रगों में साहस भरता है।
- व्याख्या: यह हमें सिखाता है कि लक्ष्य चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो और हम खुद को चाहे जितना छोटा या कमजोर क्यों न समझें, अगर हमारे प्रयासों में निरंतरता (Consistency) है, तो हमारी मेहनत कभी बेकार नहीं जाएगी।
2. गोताखोर का उदाहरण: धैर्य और बार-बार प्रयास (Patience & Resilience)
दूसरे भाग में सागर और गोताखोर के माध्यम से सफलता की गहराई को समझाया गया है।
- सीख: गोताखोर समुद्र में मोती ढूंढने के लिए बार-बार डुबकी लगाता है। कई बार उसे खाली हाथ लौटना पड़ता है। लेकिन हर असफलता उसका उत्साह कम करने के बजाय बढ़ा देती है। अंततः वह मोती निकाल ही लाता है।
- व्याख्या: वास्तविक जीवन में ‘मोती’ हमारी सफलता है। सफलता आसानी से गहरे पानी (कठिन परिस्थितियों) में छिपी होती है। शुरुआती दौर में असफलता मिलना स्वाभाविक है, लेकिन धैर्य खोए बिना बार-बार प्रयास करने से अंत में सफलता की मुट्ठी भर ही जाती है।
3. असफलता को चुनौती मानना: आत्म-विश्लेषण (Self-Analysis & Evaluation)
कविता का अंतिम भाग सबसे शक्तिशाली है, जो आज के युवाओं और विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शक है।
- सीख: कवि कहते हैं कि “असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो। क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।”
- व्याख्या: यह पंक्ति हमें सिखाती है कि असफलता से डरकर भागना या रोना नहीं चाहिए, बल्कि इसे एक फीडबैक (Feedback) की तरह लेना चाहिए। हमें अपनी कमियों का विश्लेषण (SWOT Analysis) करना चाहिए कि आखिर कमी कहाँ रह गई और फिर उसमें सुधार करना चाहिए। संघर्ष के मैदान को छोड़कर भागना किसी समस्या का समाधान नहीं है।
इस कविता से संबंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न :
प्रश्न 1: ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ कविता किसने लिखी है (Koshish karne walon ki kabhi haar nahin hoti writer)?
उत्तर: यह प्रसिद्ध कविता महान राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी जी ने लिखी है। अक्सर लोग इसे हरिवंश राय बच्चन की कविता समझने की भूल कर बैठते हैं।
प्रश्न 2: क्या अमिताभ बच्चन के पिता ने यह कविता लिखी थी?
उत्तर: नहीं, अमिताभ बच्चन के पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने यह कविता नहीं लिखी है। अमिताभ बच्चन ने खुद सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया था कि इसके असली लेखक सोहनलाल द्विवेदी हैं।
प्रश्न 3: इस कविता से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर: यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन में आने वाली असफलताओं से घबराने के बजाय हमें लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। निरंतर परिश्रम, आत्म-विश्लेषण और धैर्य से किसी भी मुश्किल लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
इस कविता की आज के परिप्रेक्ष्य की प्रासंगिकता
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, कट-थ्रोट कॉम्पिटिशन (Cut-throat Competition) और मानसिक तनाव के दौर में सोहनलाल द्विवेदी जी की यह कविता एक ‘स्ट्रेस बस्टर’ (Stress Buster) का काम करती है। चाहे प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, JEE, NEET) की तैयारी करने वाले छात्र हों, कॉर्पोरेट जगत में संघर्ष कर रहे पेशेवर हों या अपने जीवन की नई शुरुआत करने वाले उद्यमी (Entrepreneurs)। यह कविता हर वर्ग के लिए संजीवनी बूटी के समान है।
यह कविता हमें याद दिलाती है कि रातों-रात कोई महान नहीं बनता। हर चमकती हुई सफलता के पीछे न जाने कितनी रातों का संघर्ष, कितनी बार का गिरना और संभलना छुपा होता है। इसलिए, जब भी जीवन में निराशा का अंधेरा छाने लगे, आँखें बंद करिए और जोर से दोहराइए
“कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”
वास्तविक रचयिता सोहनलाल द्विवेदी जी को इस कालजयी और युग-परिवर्तक रचना के लिए कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने हिंदी साहित्य को एक ऐसा अमूल्य रत्न दिया जो सदियों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
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