
Amitabh Bachchan dialogues: सत्तर और अस्सी के दशक के उस दौर की कल्पना कीजिए, जब सिनेमाघरों के बाहर पसीने में लथपथ भीड़ टिकट के लिए कुश्ती लड़ रही होती थी। अचानक पर्दे पर एक लंबी कद-काठी का नायक, आँखों में अंगारे लिए और आवाज़ में भारीपन भरकर कहता है, “हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।”
अमिताभ बच्चन द्वारा बोला गया यह कालिया फिल्म का डायलॉग, उस वक्त सिर्फ एक संवाद नहीं था; यह सिस्टम के खिलाफ एक आम आदमी की हुंकार थी। यह उस साहस का प्रतीक था जो भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देता था। लेकिन साहब, समय का पहिया ऐसा घूमा कि आज यह ‘साहस’ का प्रतीक कम और ‘बदतमीजी’ का ट्रेडमार्क ज्यादा बन गया है। आज अगर कोई यह डायलॉग चिपकाता है, तो यकीन मानिए वह कोई क्रांतिकारी नहीं, बल्कि वही ‘सिस्टम की गंदगी’ है जिससे लड़ते-लड़ते हम बूढ़े हो गए। आइए इसपर गहराई से विचार करें।
राशन कार्ड से लेकर आईफोन की ‘प्री-बुकिंग’ तक

पुराने ज़माने में लाइन का मतलब होता था, धैर्य। लेकिन आज के ‘न्यू इंडिया’ में लाइन का मतलब हो गया है “तुझे पता है मेरा बाप कौन है?” आज कालिया का वह ‘विजय’ मर चुका है। उसकी जगह अब किसी छुटभैया नेता, गली के गुंडे ‘पिंटू भैया’ ने ले ली है, जो अपनी SUV के हॉर्न से मोहल्ले की नींद उड़ाते हुए बैंक पहुँचते हैं। बैंक में पचास बुजुर्ग अपनी पेंशन के लिए तीन घंटे से धूप में खड़े हैं, लेकिन पिंटू भैया चश्मा ऊपर चढ़ाते हैं, गार्ड को एक ‘नशीली’ मुस्कान देते हैं और सीधे मैनेजर के केबिन में घुस जाते हैं। और क्यों ना घुसे आख़िर इनके चाचा विधायक जी जो ठहरे।
पीछे से कोई बेचारा सरकारी मास्टर आवाज़ उठाता है, “भाई साहब, लाइन में आइए।”पिंटू भैया पलटते हैं और उनकी आँखों में अमिताभ बच्चन वाला ‘एंग्री यंग मैन’ जाग उठता है। वे कहते हैं, “मास्टर जी, हम जहाँ खड़े होते हैं…” यहाँ अंतर यह है कि बच्चन साहब का नायक लाइन इसलिए तोड़ता था क्योंकि वह अन्याय के खिलाफ था, और आज का ‘पिंटू’ लाइन इसलिए तोड़ता है क्योंकि उसे लगता है कि ‘नियम’ सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जिनके पास रसूख नहीं है।
राजनीति और ‘लाइन’ का नया व्याकरण
राजनीति में तो यह डायलॉग किसी सफलता मंत्र की तरह जपा जाता है। यहाँ लाइन वहीं से शुरू नहीं होती जहाँ नेता खड़ा होता है, बल्कि जहाँ नेता की गाड़ी खड़ी होती है, वहाँ से पूरा रास्ता ही ‘लाइन’ बन जाता है।
अस्पताल की इमरजेंसी हो या वीआईपी दर्शन वाली कतार, हमारा आधुनिक ‘विजय’ अपने साथ चार बाउंसर और एक सफेद कुर्ता लेकर चलता है। वह लाइन में खड़े उस बाप को धकेल कर आगे निकल जाता है जिसका बच्चा बुखार में तप रहा है।
पहले ‘लाइन’ व्यवस्था की पहचान थी, अब ‘लाइन तोड़ना’ शक्ति का प्रदर्शन है। जो जितना बड़ा गुंडा, उसकी लाइन उतनी ही छोटी।
सोशल मीडिया का ‘डिजिटल’ विजय
आजकल यह बीमारी इंटरनेट पर भी फैल गई है। यहाँ लाइन का मतलब ‘कमेंट सेक्शन’ और ‘ट्रेंड्स’ से है। यहाँ का ‘विलेन-नुमा नायक’ वह है जो बिना तर्क के सबसे पहले भद्दा कमेंट देता है। वह सोचता है कि उसने पहला कमेंट कर दिया, तो बस “लाइन वहीं से शुरू हो गई।”
इन्फ्लुएंसर्स की दुनिया में तो यह डायलॉग और भी खतरनाक है। कोई भी नया रेस्टोरेंट खुले, ये भाई साहब अपनी रिंग लाइट और फोन लेकर पहुँच जाएंगे। बाहर पचास लोग एक घंटे से वेटिंग में हैं, लेकिन हमारे ‘डिजिटल विजय’ सीधे किचन में घुसेंगे क्योंकि उनके पास दस हज़ार ‘फेक फॉलोअर्स’ हैं। उनका तर्क वही है: “मैं सेलिब्रिटी हूँ, मेरी लाइन अलग है।”
सड़क पर ‘बच्चन’गिरी
सड़क पर रेड लाइट जलती है। सब कायदे से खड़े हैं। लेकिन तभी एक साहब अपनी बड़ी सी एसयूवी को डिवाइडर के ऊपर चढ़ाते हुए सीधे ज़ेबरा क्रॉसिंग के आगे ले जाकर खड़ी कर देते हैं। पीछे वाले लोग हॉर्न बजा रहे हैं, ट्रैफिक पुलिस वाला बेचारा अपनी सीटी बजाते-बजाते फेफड़े सुखा चुका है।
लेकिन हमारे ‘सुपरहीरो’ के कान पर जूँ नहीं रेंगती। वे शीशा नीचे करते हैं, थूकते हैं और अपनी आँखों से संदेश देते हैं कि “बेटा, नियम तुम्हारे लिए हैं, मेरे लिए तो सड़क ही मेरे घर का आँगन है।” यह वही ‘दिवार’ फिल्म का विजय है, बस फर्क इतना है कि वह विजय माँ के मंदिर के सामने खड़ा था और यह विजय कानून की धज्जियाँ उड़ाने के लिए खड़ा है।
क्या साहस अब केवल गुंडागर्दी है?
गंभीरता से सोचें, तो सत्तर के दशक में इस संवाद के पीछे एक ‘नैतिकता’ थी। तब नायक अपनी मेहनत, अपने हक और अपनी सच्चाई के दम पर यह बात कहता था। वह भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता था क्योंकि भीड़ दबी-कुचली थी। वह नेतृत्व (Leadership) की बात करता था।
मगर आज? आज यह ‘हक’ की नहीं, ‘हनक’ की बात है। ध्यान से देखा जाए तो सच्चाई यह है:
- लाइन तोड़ना अब वीरता नहीं, कायरता है।
- अपना रसूख दिखाकर आगे निकल जाना बहादुरी नहीं, चोरी है।
- नियमों को ठेंगे पर रखना साहस नहीं, सामाजिक मानसिक रोग है।
कहाँ ‘लाइन’ का असली मतलब समझ आएगा
कल्पना कीजिए कि चित्रगुप्त के दरबार में भी यही हो। यमराज के पास लंबी लाइन लगी हो और अचानक धरती से गया कोई ‘वीआईपी’ वहाँ पहुँचकर कहे “यमराज जी, जरा किनारे हटिए, हम जहाँ खड़े होते हैं…”
वहाँ शायद उसे पता चलेगा कि कुछ लाइनें ऐसी होती हैं जहाँ आपका रसूख, आपकी एसयूवी और आपके ‘चाचा विधायक’ काम नहीं आते।
डायलॉग वही, नीयत नई – Amitabh Bachchan Dialogue

अमिताभ बच्चन जी ने जब यह कहा था, तो सिनेमाहॉल तालियों से गूंज उठा था क्योंकि वह एक शोषित समाज की आवाज़ थी। लेकिन आज जब कोई रसूखदार व्यक्ति यह करता है, तो आम आदमी के मन में केवल एक ही ख्याल आता है, “काश! पुलिस वाला इसे वहीं एक रसीद काट देता।”
हकीकत यह है कि आज के दौर का असली नायक वह नहीं है जो लाइन शुरू करता है, बल्कि वह है जो चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है। असली ‘विजय’ वह है जो धूप में खड़े उस आखिरी आदमी का सम्मान करता है।आज के ‘विजयों’ को समझना होगा कि भाई साहब, आप जहाँ खड़े होते हैं, वहाँ से लाइन शुरू नहीं होती, बल्कि वहाँ से ‘सिविक सेंस’ (Social Responsibility) खत्म होती है।
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